•• महत्वपूर्ण शिलालेख एवं प्रशस्तिया ••
• घोसुण्डी शिलालेख : नगरी ( चित्तौड़ ) के निकट घोसुण्डी गाँव में प्राप्त । इसमें ब्राह्मी लिपि में संस्कृत भाषा में द्वितीय शताब्दी ईसा पूर्व के गजवंश के सर्वतात द्वारा अश्वमेघ यज्ञ करने एवं चारदीवारी बनाने का उल्लेख है ।
• नाथ प्रशस्ति : 971 ई . का यह लेख एकलिंगजी के मंदिर के पास लकुलीश मंदिर से प्राप्त हुआ है । इसमें नागदा नगर एवं बापा , गुहिल तथा नरवाहन राजाओं का वर्णन है ।
• हर्षनाथ की प्रशस्ति : हर्षनाथ ( सीकर ) के मंदिर की यह 973 ई . की है । इसमें मंदिर का निर्माण आपट द्वारा किया प्रशस्ति का उल्लेख है । इसमें चौहानों के वंशक्रम का उल्लेख है ।
• आर्थणा के शिवमंदिर की प्रशस्ति : आथूणा ( बाँसवाडा ) के शिवालय में उत्कीर्ण 1079 ई . के इस अभिलेख में वागड़ के परमार नरेशों का अच्छा वर्णन है ।
• किराडू का लेख : किराडू ( बाडमेर ) के शिवमंदिर में संस्कृत में 1161 ई . का उत्कीर्ण लेख जिसमें वहाँ की परमार शाखा का वंशक्रम दिया है । इसमें परमारों की उत्पत्ति ऋषि वशिष्ठ के आबू यज्ञ से बताई गई है ।
प्रशस्ति | रचयिता
• बिजौलिया शिलालेख | गुणभद्र
• जैन कीर्तिस्तंभ लेख | जीजा
• कीर्तिस्तम्भ प्रशस्ति | कवि अत्रि व महेश भट्ट
• रायसिंह प्रशस्ति | जैता
• जगन्नाथ राय प्रशस्ति | कृष्णभट्ट
• राज प्रशस्ति | रणछोड़भट्ट तैलंग
• बिजौलिया शिलालेख : बिजौलिया के पार्श्वनाथ मंदिर के पास एक चट्टान पर उत्कीर्ण 1170 ई . का यह शिलालेख जैन श्रावक लोलाक द्वारा मंदिर के निर्माण की स्मृति में बनवाया गया था । इसमें सांभर व अजमेर के चौहानों को वत्सगौत्रीय ब्राह्मण बताते हुए उनकी वंशावली दी गई है । इसका रचयिता गुणभद्र था । इस लेख में उस समय के क्षेत्रों के प्राचीन नाम भी दिये गये हैं ।
• सच्चिका माता मंदिर की प्रशस्ति :ओसियाँ ( जोधपुर ) में सचिया माता के मंदिर में उत्कीर्ण इस लेख में कल्हण एवं कीतिपाल का वर्णन है ।
• लूणवसही व नेमिनाथ की प्रशस्ति : माउण्ट आबू के इन प्रसिद्ध जैन मंदिरों में इनके निर्माता वस्तुपाल , तेजपाल तथा आबू के परमार वंशीय शासकों की वंशावली दी हुई है । यह प्रशस्ति उस समय के जनसमुदाय की विद्यानिष्ठा दान परायणता एवं धर्मनिष्ठा की भावना का अच्छा वर्णन करती है।• चीरवा का शिलालेख : चीरवा ( उदयपुर ) के एक मंदिर के बाहरी द्वार पर उत्कीर्ण 1273 ई . का यह शिलालेख बापा रावल के वंशजों की कीर्ति का वर्णन करता है ।
• जैन कीर्तिस्तंभ : चित्तौड़ के जैन कीर्ति स्तंभ में उत्कीर्ण तीन अभिलेखों का स्थापनका जीजा था । इसमें जीजा के वंश , मंदिर निर्माण एवं दानों का वर्णन मिलता है । ये 13वीं सदी के हैं ।
• रणकपुर प्रशस्ति : रणकपुर के चौमुखा मंदिर के स्तंभ पर उत्कीर्ण यह प्रशस्ति 1439 ई . की है । इसमें मेवाड़ के राजवंश , धरणक सेठ के वंश एवं उसके शिल्पी का परिचय दिया गया है । इसमें बापा एवं कालभोज को अलग - अलग व्यक्ति बताया गया है । इसमें महाराणा कुंभा की विजयों एवं विरुदों का पूरा वर्णन है ।
• कीर्ति स्तंभ प्रशस्ति : यह विजय स्तंभ में संस्कृत भाषा में कई शिलाओं पर कुंभा के समय ( दिस . , 1460 ई . ) में उत्कीर्ण की गई है । अब केवल दो ही शिलाएँ उपलब्ध हैं । इस प्रशस्ति में बापा से लेकर कुंभा तक की विस्तृत वंशावली एवं उनकी उपलब्धियों का वर्णन है । इसके प्रशस्तिकार महेश भट्ट हैं ।
• कुंभलगढ़ का शिलालेख( 1460ई . ) : यह 5 शिलाओं पर उत्कीर्ण था जो कुंभश्याम मंदिर ( कुंभलगढ़ ) , जिसे अब मामदेव मंदिर कहते हैं , में लगाई हुई थीं । इसके राज वर्णन में गुहिल वंश का विवरण एवं शासकों की उपलब्धियों का वर्णन मिलता है । इसमें बापा रावल को विप्रवंशीय बताया गया है । रचयिताः कवि महेश ।
• एकलिंगजी के मंदिर की दक्षिण द्वार की प्रशस्ति : यह महाराणा रायमल द्वारा मंदिर के जीर्णोद्धार के समय ( मार्च , 1488 ई . ) उत्कीर्ण की गई है । इसमें भी मेवाड़ के शासकों की वंशावली , तत्कालीन समाज की आर्थिक , सामाजिक , धार्मिक स्थिति व नैतिक स्तर की जानकारी दी गई है । इसके रचियता महेश भट्ट हैं ।
• रायसिंह प्रशस्ति ( जूनागढ़ प्रशस्ति ) : बीकानेर नरेश रायसिंह द्वारा जूनागढ़ दुर्ग में स्थापित की गई प्रशस्ति जिसमें दुर्ग के निर्माण की तिथि तथा राव बीका से लेकर राव रायसिंह तक के शासकों की उपलब्धियों का वर्णन है । इसके रचयिता जइता नामक जैन मुनि थे । यह संस्कृत भाषा में है ।
• जगन्नाथ राय प्रशस्ति : यह उदयपुर के जगन्नाथराय मंदिर में काले पत्थर पर मई , 1652 में उत्कीर्ण की गई थी । इसमें बापा से सांगा तक की उपलब्धियों , हल्दीघाटी युद्ध , कर्ण के समय सिरोंज के विनाश के वर्णन के अलावा महाराणा जगतसिंह के युद्धों एवं पुण्य कार्यों का विस्तृत विवेचन है । प्रशस्ति के रचयिता कृष्णभट्ट हैं ।
• राज प्रशस्ति : राजसमन्द झील की नौ चौकी पाल की ताकों में लगी 25 काले पाषाणों पर संस्कृत में उत्कीर्ण यह प्रशस्ति 1676 ई . में महाराजा राजसिंह द्वारा स्थापित कराई गई । यह पद्यमय है । इसके रचयिता रणछोड़ भट्ट तैलंग थे । इसमें बापा से लेकर जगतसिंह - राजसिंह तक के शासकों की वंशावली व उपलब्धियों तथा महाराणा अमरसिंह द्वारा मगलों से की गई संधि का उल्लेख है । राजसिंह के समय का विशद वर्णन है ।
• वैद्यनाथ मंदिर की प्रशस्ति : पिछोला झील ( उदयपुर ) के निकट सीसारमा गाँव के वैद्यनाथ मंदिर में स्थित महाराणा संग्राम सिंह द्वितीय यह प्रशस्ति 1719 ई . की है । इसमें बापा के हारीत ऋषि की कृपा से राज्य प्रालिका मेयर तथा बापा से लेकर संग्रामसिंह - द्वितीय जिसने यह मंदिर बनवाया था , तक का संक्षिप्त परिचय है ।
• गजशाही - बीकानेर
• उदयशाही - डुँगरपुर
• स्वरूपशाही , चाँदोड़ी - मेवाड़
• रावशाही - अलवर
• अखैशाही - जैसलमेर
• गुमानशाही - कोटा
• झाड़शाही - जयपुर
• मदनशाही - झालावाड़
• तमंचाशाही - धौलपुर
• रामशाही - बूंदी
• घोसुण्डी शिलालेख : नगरी ( चित्तौड़ ) के निकट घोसुण्डी गाँव में प्राप्त । इसमें ब्राह्मी लिपि में संस्कृत भाषा में द्वितीय शताब्दी ईसा पूर्व के गजवंश के सर्वतात द्वारा अश्वमेघ यज्ञ करने एवं चारदीवारी बनाने का उल्लेख है ।
• नाथ प्रशस्ति : 971 ई . का यह लेख एकलिंगजी के मंदिर के पास लकुलीश मंदिर से प्राप्त हुआ है । इसमें नागदा नगर एवं बापा , गुहिल तथा नरवाहन राजाओं का वर्णन है ।
• हर्षनाथ की प्रशस्ति : हर्षनाथ ( सीकर ) के मंदिर की यह 973 ई . की है । इसमें मंदिर का निर्माण आपट द्वारा किया प्रशस्ति का उल्लेख है । इसमें चौहानों के वंशक्रम का उल्लेख है ।
• आर्थणा के शिवमंदिर की प्रशस्ति : आथूणा ( बाँसवाडा ) के शिवालय में उत्कीर्ण 1079 ई . के इस अभिलेख में वागड़ के परमार नरेशों का अच्छा वर्णन है ।
• किराडू का लेख : किराडू ( बाडमेर ) के शिवमंदिर में संस्कृत में 1161 ई . का उत्कीर्ण लेख जिसमें वहाँ की परमार शाखा का वंशक्रम दिया है । इसमें परमारों की उत्पत्ति ऋषि वशिष्ठ के आबू यज्ञ से बताई गई है ।
प्रशस्ति | रचयिता
• बिजौलिया शिलालेख | गुणभद्र
• जैन कीर्तिस्तंभ लेख | जीजा
• कीर्तिस्तम्भ प्रशस्ति | कवि अत्रि व महेश भट्ट
• रायसिंह प्रशस्ति | जैता
• जगन्नाथ राय प्रशस्ति | कृष्णभट्ट
• राज प्रशस्ति | रणछोड़भट्ट तैलंग
• बिजौलिया शिलालेख : बिजौलिया के पार्श्वनाथ मंदिर के पास एक चट्टान पर उत्कीर्ण 1170 ई . का यह शिलालेख जैन श्रावक लोलाक द्वारा मंदिर के निर्माण की स्मृति में बनवाया गया था । इसमें सांभर व अजमेर के चौहानों को वत्सगौत्रीय ब्राह्मण बताते हुए उनकी वंशावली दी गई है । इसका रचयिता गुणभद्र था । इस लेख में उस समय के क्षेत्रों के प्राचीन नाम भी दिये गये हैं ।
• सच्चिका माता मंदिर की प्रशस्ति :ओसियाँ ( जोधपुर ) में सचिया माता के मंदिर में उत्कीर्ण इस लेख में कल्हण एवं कीतिपाल का वर्णन है ।
• लूणवसही व नेमिनाथ की प्रशस्ति : माउण्ट आबू के इन प्रसिद्ध जैन मंदिरों में इनके निर्माता वस्तुपाल , तेजपाल तथा आबू के परमार वंशीय शासकों की वंशावली दी हुई है । यह प्रशस्ति उस समय के जनसमुदाय की विद्यानिष्ठा दान परायणता एवं धर्मनिष्ठा की भावना का अच्छा वर्णन करती है।• चीरवा का शिलालेख : चीरवा ( उदयपुर ) के एक मंदिर के बाहरी द्वार पर उत्कीर्ण 1273 ई . का यह शिलालेख बापा रावल के वंशजों की कीर्ति का वर्णन करता है ।
• जैन कीर्तिस्तंभ : चित्तौड़ के जैन कीर्ति स्तंभ में उत्कीर्ण तीन अभिलेखों का स्थापनका जीजा था । इसमें जीजा के वंश , मंदिर निर्माण एवं दानों का वर्णन मिलता है । ये 13वीं सदी के हैं ।
• रणकपुर प्रशस्ति : रणकपुर के चौमुखा मंदिर के स्तंभ पर उत्कीर्ण यह प्रशस्ति 1439 ई . की है । इसमें मेवाड़ के राजवंश , धरणक सेठ के वंश एवं उसके शिल्पी का परिचय दिया गया है । इसमें बापा एवं कालभोज को अलग - अलग व्यक्ति बताया गया है । इसमें महाराणा कुंभा की विजयों एवं विरुदों का पूरा वर्णन है ।
• कीर्ति स्तंभ प्रशस्ति : यह विजय स्तंभ में संस्कृत भाषा में कई शिलाओं पर कुंभा के समय ( दिस . , 1460 ई . ) में उत्कीर्ण की गई है । अब केवल दो ही शिलाएँ उपलब्ध हैं । इस प्रशस्ति में बापा से लेकर कुंभा तक की विस्तृत वंशावली एवं उनकी उपलब्धियों का वर्णन है । इसके प्रशस्तिकार महेश भट्ट हैं ।
• कुंभलगढ़ का शिलालेख( 1460ई . ) : यह 5 शिलाओं पर उत्कीर्ण था जो कुंभश्याम मंदिर ( कुंभलगढ़ ) , जिसे अब मामदेव मंदिर कहते हैं , में लगाई हुई थीं । इसके राज वर्णन में गुहिल वंश का विवरण एवं शासकों की उपलब्धियों का वर्णन मिलता है । इसमें बापा रावल को विप्रवंशीय बताया गया है । रचयिताः कवि महेश ।
• एकलिंगजी के मंदिर की दक्षिण द्वार की प्रशस्ति : यह महाराणा रायमल द्वारा मंदिर के जीर्णोद्धार के समय ( मार्च , 1488 ई . ) उत्कीर्ण की गई है । इसमें भी मेवाड़ के शासकों की वंशावली , तत्कालीन समाज की आर्थिक , सामाजिक , धार्मिक स्थिति व नैतिक स्तर की जानकारी दी गई है । इसके रचियता महेश भट्ट हैं ।
• रायसिंह प्रशस्ति ( जूनागढ़ प्रशस्ति ) : बीकानेर नरेश रायसिंह द्वारा जूनागढ़ दुर्ग में स्थापित की गई प्रशस्ति जिसमें दुर्ग के निर्माण की तिथि तथा राव बीका से लेकर राव रायसिंह तक के शासकों की उपलब्धियों का वर्णन है । इसके रचयिता जइता नामक जैन मुनि थे । यह संस्कृत भाषा में है ।
• जगन्नाथ राय प्रशस्ति : यह उदयपुर के जगन्नाथराय मंदिर में काले पत्थर पर मई , 1652 में उत्कीर्ण की गई थी । इसमें बापा से सांगा तक की उपलब्धियों , हल्दीघाटी युद्ध , कर्ण के समय सिरोंज के विनाश के वर्णन के अलावा महाराणा जगतसिंह के युद्धों एवं पुण्य कार्यों का विस्तृत विवेचन है । प्रशस्ति के रचयिता कृष्णभट्ट हैं ।
• राज प्रशस्ति : राजसमन्द झील की नौ चौकी पाल की ताकों में लगी 25 काले पाषाणों पर संस्कृत में उत्कीर्ण यह प्रशस्ति 1676 ई . में महाराजा राजसिंह द्वारा स्थापित कराई गई । यह पद्यमय है । इसके रचयिता रणछोड़ भट्ट तैलंग थे । इसमें बापा से लेकर जगतसिंह - राजसिंह तक के शासकों की वंशावली व उपलब्धियों तथा महाराणा अमरसिंह द्वारा मगलों से की गई संधि का उल्लेख है । राजसिंह के समय का विशद वर्णन है ।
• वैद्यनाथ मंदिर की प्रशस्ति : पिछोला झील ( उदयपुर ) के निकट सीसारमा गाँव के वैद्यनाथ मंदिर में स्थित महाराणा संग्राम सिंह द्वितीय यह प्रशस्ति 1719 ई . की है । इसमें बापा के हारीत ऋषि की कृपा से राज्य प्रालिका मेयर तथा बापा से लेकर संग्रामसिंह - द्वितीय जिसने यह मंदिर बनवाया था , तक का संक्षिप्त परिचय है ।
विभिन्न रियासतों में प्रचलित सिक्के
• विजयशाही , भीमशाही - जोधपुर• गजशाही - बीकानेर
• उदयशाही - डुँगरपुर
• स्वरूपशाही , चाँदोड़ी - मेवाड़
• रावशाही - अलवर
• अखैशाही - जैसलमेर
• गुमानशाही - कोटा
• झाड़शाही - जयपुर
• मदनशाही - झालावाड़
• तमंचाशाही - धौलपुर
• रामशाही - बूंदी
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